Tuesday, 14 November 2017

💥देव स्थल पर देवी-देवताओं के दर्शनोपरांत उनकी प्रतिमा की परिक्रमा की जाती है। शास्त्रों में बताया गया है भगवान की परिक्रमा से अक्षय पुण्य मिलता है और पाप नष्ट होते हैं। इस परंपरा के पीछे धार्मिक महत्व के साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। जिन मंदिरों में पूरे विधि-विधान के साथ देवी-देवताओं की मूर्ति स्थापित की जाती है, वहां मूर्ति के आसपास दिव्य शक्ति हमेशा सक्रिय रहती है। मूर्ति की परिक्रमा करने से उस शक्ति से हमें भी ऊर्जा मिलती है। इस ऊर्जा से मन शांत होता है। जिस दिशा में घड़ी की सुई घुमती है, उसी दिशा में परिक्रमा करनी चाहिए, क्योंकि दैवीय ऊर्जा का प्रवाह भी इसीप्रकार रहता है।

👉किस भगवान की कितनी परिक्रमा करना चाहिए:-----------------------

★आदि शक्ति की किसी भी स्वरूप माँ लक्ष्मी, माँ पार्वती , माँ सरस्वती इत्यादि की केवल एक परिक्रमा करनी चाहिए।

★भगवान विष्णुजी एवं उनके सभी अवतारों की चार परिक्रमा करनी चाहिए।( श्री कृष्ण अवतार को छोड़ कर )

★श्रीगणेशजी और हनुमानजी की तीन परिक्रमा करने का विधान है।

★शिवजी की आधी परिक्रमा करनी चाहिए जिसे चंद्राकार परिक्रमा भी कबा जाता है , क्योंकि शिवजी के अभिषेक की धारा को लाघंना अशुभ माना जाता है।

👉परिक्रमा करते समय ध्यान रखनी चाहिए ये बातें:-------------------

★जिस देवी-देवता की परिक्रमा की जा रही है, उनके मंत्रों का जप करना चाहिए।

★भगवान की परिक्रमा करते समय मन में बुराई, क्रोध, तनाव जैसे भाव नहीं होना चाहिए।

★परिक्रमा हमेशा नंगे पैर ही करना चाहिए।

★परिक्रमा करते समय बातें नहीं करना चाहिए। शांत मन से परिक्रमा करें।

★ परिक्रमा आरम्भ करने के पश्चात बीच मे नहीं छोड़नी चाहिए जहा से परिक्रमा आरम्भ करें वहीं समाप्त करें ।

★परिक्रमा बहूत तेज या धीमी गति से नहीं करनी चाहिए ।

★परिक्रमा करते समय प्रतिमा की पीठ के पास खड़े होकर इष्टदेव से कामना करनी चाहिए । माना जाता है भगवन इस कामना को अति शीघ्र पुर्ण करते हैं ।

★प्रत्येक परिक्रमा की समाप्ति पर देव प्रतिमा को प्रणाम करना चाहिए व परिक्रमा पुर्ण होने पर देव प्रतिमा को पीठ नहीं दिखानी चाहिए,उल्टे पैर वापिस लौटना चाहिए ।

★परिक्रमा करते समय तुलसी, रुद्राक्ष आदि की माला पहनेंगे तो बहुत शुभ रहता है।